शिमला | हिमाचल प्रदेश में पंचायतों का पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन से पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव आगे सरक जाएंगे। सरकार ने पंचायतों का पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन का फैसला लिया है। इसका सीधा असर संस्थाओं के चुनाव पर पड़ सकता है। वहीं, राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव की तैयारियां पूरी कर ली हैं। आयोग को सिर्फ रोस्टर की अधिसूचना का इंतजार है, लेकिन इसी बीच प्रदेश सरकार ने पंचायतों का पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन करने का फैसला लिया है। इस प्रक्रिया में दो महीने का समय लग सकता है। ऐसे में चुनाव चार महीने आगे सरक सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में डिजास्टर एक्ट लगा है। दूसरा पंचायत चुनाव का मामला कोर्ट में विचाराधीन है। 31 जनवरी, 2026 को संस्थाओं का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है।
सरकार और राज्य आयोग के बीच चल रही खींचतान के चलते कैबिनेट ने पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन का फैसला लिया है। अब पंचायतों की नई सीमाएं तय होंगी। इस स्थिति में मौजूदा मतदाता सूची अप्रासंगिक हो जाएगी और राज्य निर्वाचन आयोग को ऐसे पंचायत क्षेत्र में मतदाताओं का नया ब्योरा तैयार करना पड़ेगा। इससे न केवल प्रशासनिक स्तर पर तैयारियों में देरी होगी, बल्कि जनवरी 2026 में प्रस्तावित पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव भी आगे खिसक सकते हैं। पंचायतों में दोबारा से वोटर लिस्ट के लिए मैपिंग होगी और फाइनल वोटर लिस्ट तैयार की जाएगी। इस प्रक्रिया को पूरी करने में राज्य निर्वाचन आयोग को समय लग सकता है।
बढ़ सकती है पंचायतों की संख्या
हिमाचल में 3577 पंचायतें है। अब पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन के चलते इनकी संख्या बढ़ सकती है। वहीं प्रदेश में 91 पंचायत समितियों सहित 250 जिला परिषद वार्डों में सदस्यों के चुनने के लिए चुनाव होने हैं। संविधान के प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए तीनों स्तरों पर पंचायती राज संस्थाओं के सदस्यों और अध्यक्ष के पदों पर आरक्षण दिया जा रहा है। इसी तरह से पंचायतों में प्रधान, वार्ड सदस्यों, पंचायत समितियों और जिला परिषद के सदस्यों के लिए चुनाव लड़ने के लिए भी आरक्षण का प्रावधान किया गया है। प्रदेश में केवल उपप्रधान का ऐसा पद है, जो अनारक्षित है। इस पद पर किसी भी वर्ग का व्यक्ति चुनाव चुनाव लड़ने के लिए अपना नामांकन दाखिल कर सकता है।
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