नाहन | उत्तराखंड के दसऊ गांव से पशमी पहुंची चालदा महासू महाराज की यात्रा ऐतिहासिक बन गई है। करीब एक सप्ताह तक चली यात्रा के एक लाख से अधिक श्रद्धालु प्रत्यक्षदर्शी बने। इसमें श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र सबसे आगे चल रहे विशाल काडका (तांबे का बर्तन) रहा। महाराज के साथ ही दसऊ से करीब 70 बकरे भी साथ पहुंचे हैं। साल भर तक इनकी देखभाल का जिम्मा स्थानीय परिवारों को दिया गया है।प्रदेश के लोगों को यात्रा से साक्षी बनने पर पहली बार कई देव परंपराओं का पता चला है। इसमें चालदा महासू के आगे-आगे चलने वाले काडका (स्थानीय भाषा में तांबे के विशाल बर्तन) परंपरा का हिस्सा रहा। न्याय के देवता चालदा महासू अपनी पालकी में आते हैं। पालकी के आगे-आगे काडका और छत्र न्याय के प्रतीक के रूप में आगे रहता है। माना जाता है कि यह देव आगमन का संकेत देते हैं। रास्ते में आने वाली बाधाओं को भी दूर करते हैं।
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